Saturday, 25 June 2016

फूलोंने मुझको' हँसना सिखाया

फूलोंने हँसना सिखाया मुझे
काँटोंने सबको रुलाया.
कभी हँस कभी रो यही जिंदगी है
सितारेंने मुझको चमकना सिखाया

कभी सुख कभी दुख मिलेगा मुझे
धरतीने मुझको सहना सिखाया

कभी चॉंद बढता कभी चॉंद घटता
कभी यश मिलेगा, अपयश कभी तो
झरनेने मुझको चलना सिखाया

न डर किसीसे चलतेही रहना
लडना है हरदम विपदा बलासे
चीँटीने मुझको संग्रह सिखाया

हो राह फूलोंकी फिरभी न रमना
हो राह फतरीली फिरभी न थमना
लक्ष्य नदियाने अंतिम दिखाया

खिलती कलियॉं मुरझानेको
हँसकर एक दिन मर जानेको
मरनेसे पहले सुकीर्ति सौरभ
फैलाते रहना मुझको सिखाया .

1 comment:

  1. किससे क्या क्या सीख सकते है हम यह इस कविता का विषय है

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